Tuesday, May 24, 2011

nice poem


उनको ये शिकायत है मैं बेवफ़ाई पे नही लिखता,

और मैं सोचता हूँ कि मैं उनकी रुसवाई पे नही लिखता.'



'ख़ुद अपने से ज़्यादा बुरा ज़माने में कौन है

मैं इसलिए औरों की बुराई पे नही लिखता.'



'कुछ तो आदत से मज़बूर हैं और कुछ फ़ितरतों की पसंद है ,

ज़ख़्म कितने भी गहरे हों मैं उनकी दुहाई पे नही लिखता.'



'दुनिया का क्या है हर हाल में इल्ज़ाम लगाती है,

वरना क्या बात कि मैं कुछ अपनी सफ़ाई पे नही लिखता.'



'शान--अमीरी पे करू कुछ अर्ज़ मगर एक रुकावट है,

मेरे उसूल, मैं गुनाहों की कमाई पे नही लिखता.'



'उसकी ताक़त का नशा "मंत्र और कलमे" में बराबर है !!

मेरे दोस्तों!! मैं मज़हब की लड़ाई पे नही लिखता.'



'समंदर को परखने का मेरा नज़रिया ही अलग है यारों!!

मिज़ाज़ों पे लिखता हूँ मैं उसकी गहराई पे नही लिखता.'



'पराए दर्द को मैं ग़ज़लों में महसूस करता हूँ ,

ये सच है मैं शज़र से फल की जुदाई पे नही लिखता.'



तजुर्बा तेरी मोहब्बत का ना लिखने की वजह बस ये!!

क़ि 'शायर' इश्क़ में ख़ुद अपनी तबाही पे नही लिखता !

                                                                          Mr. lonely

Thursday, September 2, 2010

my life

मेरी जिन्दगी पल दो पल की
चिल-मिल में यु ही बीत गेई !


मैंने न जाना इसे
मै ने न  माना  इसे
सब कुछ खेल समझा
इस धरा को जेल समझा



कुछ बीत गया
कुछ बीत जाएगा
आज सब कुछ है
कल कहा कुछ रह पाएगा !



भूत को भूत समझकर
मै भूल से भूल गया
वर्तमान को कुचल कर
भविष्य अँधेरे मै ढल गया



मै अपने में मस्त रहा
फिर भी जीवन कष्ट रहा
सब कुछ पाकर भी और और करता रहा
मै जीवित ही यहाँ  यु मरता रहा 



क्योकि जीता था 
जिस शीतलता के लिए 
आज उस मन की शीत गई


 मेरी जिन्दगी पल दो पल की
चिल-मिल मै यु ही बीत गई !

Tuesday, August 31, 2010

wo nepali

वो नेपाली  नेपाल से आता है , 


 दर-दर की ठोकरे खता है ,
 दर्द से रात दिन चिल्लाता है, 
  क्या फिर्  भी  कोए सुन पाता है  !

सुबह निकलता, काम की तलाश मे,
षण-षण मरता अपनी ही लाश मे !


फिर भी काम मे 
 जुट जाता है ,
 न मिलाने पर
बोझा तब भी धो जाता है!


हर घर से दो कपडे
दो रोटी  की आश मे ,
काम करने जाता ,
हर पल दो पैसे की प्यास मे !


मैंने पुचा :-
क्या अपने तक ही हो सीमित ,
क्या कोई  है तुम्हारा ,
 या हो सबसे तिरस्कृत !


मैंने फिर विचार किया ,
ये मैंने उससे क्या कह दिया ,
मानो उसकी आशुओ से
सारा जहा डूब गया !


कहने लगा :-
बाबु जी ! नेपाली हु ,
नेपाल से आया हु ,
दर-दर की ठोकरे
इस  माथे पे लिख लाया हु !


घर मे है बीबी बच्चे ,
फिर भी सन्याश ग्रहण
कर आया हु !
यहाँ पेसे ने तो
नेपाल मे मऊ-वादियों
का सताया हु !


जब शाम को लोटता हु ,
किसी के घर से गुजरता हु ,
कोई दो रोटी खिला देता है ,
या कुत्ता तब भी भगा देता है !


सुनकर उसकी यह व्यथा ,
मै हताश हुआ अथाह 
देखकर उसके जीवन संघर्ष
हा वह है बलशाली !
                                                              हा वो है नेपाली
                                                                वो नेपाली !!!!!!!!!!!!!!!!!!