वो नेपाली नेपाल से आता है ,
दर-दर की ठोकरे खता है ,
दर्द से रात दिन चिल्लाता है,
क्या फिर् भी कोए सुन पाता है !
सुबह निकलता, काम की तलाश मे,
षण-षण मरता अपनी ही लाश मे !
फिर भी काम मे
जुट जाता है ,
न मिलाने पर
बोझा तब भी धो जाता है!
हर घर से दो कपडे
दो रोटी की आश मे ,
काम करने जाता ,
हर पल दो पैसे की प्यास मे !
मैंने पुचा :-
क्या अपने तक ही हो सीमित ,
क्या कोई है तुम्हारा ,
या हो सबसे तिरस्कृत !
मैंने फिर विचार किया ,
ये मैंने उससे क्या कह दिया ,
मानो उसकी आशुओ से
सारा जहा डूब गया !
कहने लगा :-
बाबु जी ! नेपाली हु ,
नेपाल से आया हु ,
दर-दर की ठोकरे
इस माथे पे लिख लाया हु !
घर मे है बीबी बच्चे ,
फिर भी सन्याश ग्रहण
कर आया हु !
यहाँ पेसे ने तो
नेपाल मे मऊ-वादियों
का सताया हु !
जब शाम को लोटता हु ,
किसी के घर से गुजरता हु ,
कोई दो रोटी खिला देता है ,
या कुत्ता तब भी भगा देता है !
सुनकर उसकी यह व्यथा ,
मै हताश हुआ अथाह
देखकर उसके जीवन संघर्ष
हा वह है बलशाली !
हा वो है नेपाली
वो नेपाली !!!!!!!!!!!!!!!!!!