Tuesday, August 31, 2010

wo nepali

वो नेपाली  नेपाल से आता है , 


 दर-दर की ठोकरे खता है ,
 दर्द से रात दिन चिल्लाता है, 
  क्या फिर्  भी  कोए सुन पाता है  !

सुबह निकलता, काम की तलाश मे,
षण-षण मरता अपनी ही लाश मे !


फिर भी काम मे 
 जुट जाता है ,
 न मिलाने पर
बोझा तब भी धो जाता है!


हर घर से दो कपडे
दो रोटी  की आश मे ,
काम करने जाता ,
हर पल दो पैसे की प्यास मे !


मैंने पुचा :-
क्या अपने तक ही हो सीमित ,
क्या कोई  है तुम्हारा ,
 या हो सबसे तिरस्कृत !


मैंने फिर विचार किया ,
ये मैंने उससे क्या कह दिया ,
मानो उसकी आशुओ से
सारा जहा डूब गया !


कहने लगा :-
बाबु जी ! नेपाली हु ,
नेपाल से आया हु ,
दर-दर की ठोकरे
इस  माथे पे लिख लाया हु !


घर मे है बीबी बच्चे ,
फिर भी सन्याश ग्रहण
कर आया हु !
यहाँ पेसे ने तो
नेपाल मे मऊ-वादियों
का सताया हु !


जब शाम को लोटता हु ,
किसी के घर से गुजरता हु ,
कोई दो रोटी खिला देता है ,
या कुत्ता तब भी भगा देता है !


सुनकर उसकी यह व्यथा ,
मै हताश हुआ अथाह 
देखकर उसके जीवन संघर्ष
हा वह है बलशाली !
                                                              हा वो है नेपाली
                                                                वो नेपाली !!!!!!!!!!!!!!!!!!